अपने ही नाखुनों से घायल होता सिख समाज…

“चिडि़यों से मै बाज तड़ाऊं। सवा लाख से एक लड़ाऊं। तभी गोबिंद सिंह नाम कहाऊं।” गुरु गोबिंद सिंह

ऊपर लिखे गुरु गोबिंद सिंह जी के शब्द एक मुर्दा हो चुके इंसान में भी कईं शेरों की ताक़त फूंक देते हैं ओर जिन इंसानों के अंदर योश ओर हिम्मत फूंकने लिए उन्होंने यह शब्द इस्तेमाल किये थे वो थे जुझारू सिख ओर सही में उन सिखों के अंदर कईं शेरों की ताक़त आ गयी थी जिसकी बदौलत उन्होंने खूंखार मुग़ल सिपाहियों को लोहे के चने चबवा दिए थे। गुरु गोबिंद सिंह जी के बारे में हम जितना भी  कहें वह उतना ही कम है। वह मानवता, न्याय, कुर्बानी, बराबरी, हक़,आपसी सद्धभावना, और धर्म के बुलंद ओर सच्चे प्रतीक थे। अपने  सारे परिवार को अपने देश, धर्म और इंसानियत के लिए कैसे कुर्बान किया जाता है वह कोई इनसे सीखे। यह वही गुरु हैं जिन्होने चिड़ियों जैसे इंसानों के अंदर भी बाजों जैसी ताकत, शूरवीरता, और हिम्मत भर दी थी। यह वही गुरु हैं जिनकी एक हुँकार से ही सिखों के अंदर योश और हिम्मत का  लोहा भर जाता था। गुरु गोबिंद सिंह की भारत देश पर उनकी कुर्बानी की मिसाल हर देश में बड़े उत्साह और गर्व से दी जाती है। बिना किसी लालच, परिवार-मोह, राजनैतिक  मतलब, अहंकार, और स्वार्थ के बिना देश, कोम, और धर्म के लिए अगर कोई लड़ा है तो वह हैं गुरु गोबिंद सिंह जी।

गुरु गोबिंद सिंह जी एक महान लिखारी, कवी, और योद्धा भी थे। किस तरह उन्होने औरंगज़ेब को ‘ज़फरनामा’ लिखकर उसके झूठे ईमान, खोखला धर्म, और फूले  हुए अहंकार को ललकारा और किस तरह उनके लिखे हुए आत्मा को हिला देने वाले बोल पड़ कर वह  दुखी हुआ और पश्चाताप की आग में जला यह भी खुद में काबिले तारीफ़ है, इसकी जितनी प्रशंसा की जाए वह कम है।  आम इंसान को अगर यह खबर दे दी जाए कि उसके बेटे को स्कूल में खेलते वक़्त  लग गयी है (वह चोट मामूली ही क्यों न हो) तो बाप होने के नाते वह दर्द से कांप उठता है और फ़ौरन अपने बच्चे की खबर लेने के लिए दौड़ पड़ता है मगर वह फौलादी  सीना गुरु गोबिंद सिंह जी का ही था जिस सीने में दिल को खंजर की तरह काट कर रख देने वाली खबर मिली की उनके चारों साहिबज़ादे धर्म, ईमान, और सचाई के नाम पर शहीदी जाम पी गए हैं। वह पहाड़ जैसा सीना गुरु जी का ही था जिस सीने में धड़कते हुए दिल ने रत्ती भर भी आह नहीं की। वह सीना गुरु जी का ही था जिसने अपने नन्हे और मासूम  बेटों की कुर्बानी को आम बात की तरह लिया मानो कुछ हुआ ही न हो। इस बात पर यकीन करना अपने आप में बड़े अचरज और हैरानगी की बात है कि कैसे एक पिता अपने चारों मासूम शहीदों के दुःख की पीड़ा को  सहज तरीके से बर्दाश्त कर गया। पर ऐसा हुआ है, ऐसा बिलकुल हुआ है और गुरु गोबिंद सिंह जी इस सराहनीये घटना की महान और न मिलने वाली मिसाल हैं।

सबसे पहली, महान, और काबिले तारीफ़  कुर्बानी उन्होने अपने पिता ‘गुरु तेगबहादुर राय’ के रूप में दे जिन्होने  कश्मीरी हिन्दुओं के धर्म को बचाने के लिए 1675 में  अपना सर कुर्बान कर दिया।  औरंगज़ेब कहता गया की दीन (मुस्लिम धर्म) कबूल कर लो मगर गुरु तेगबहादुर भी सच, हिम्मत, मानवता, और हक़ की भावना से ओतप्रोत थे, उन्होंने भी कह डाला की अपना सर कलम कराना मंजूर है पर अपना सिखी धर्म नहीं।  दूसरी कुर्बानी दी उन्होने अपने शूरवीर और महान बेटों की जिन्होने सच, हक़, और इंसानियत की राह पर  लड़ते लड़ते अपने प्राण गँवा दिए।  दो बड़े बेटों (साहिबज़ादा अजीत सिंह, उम्र 17 साल और साहिबज़ादा जुझार सिंह, उम्र 13 साल) ने तो लड़ाई के मैदान में ज़ालिम और हैवानियत से भरपूर मुग़ल सिपाहीओं के छक्के छुड़ा दिए, सिपाहीओं को तो ऐसा लग रहा था मानो की कईं महान  और युद्ध कला के माहिर योद्धा लड़ रहे हों। जिस अंदाज़ और निडरता से वह लड़ रहे थे ऐसा लग रहा था मानो की एक बीटा 20-25 सिपाहीओं पर भारी पड़ रहा हो। और अंत में दोनों को कुर्बान हो जाना पड़ा पर उन्हें इस बात का अफ़सोस बिलकुल भी नहीं था की सच और धर्म को बचाने के लिए उन्होने अपना योगदान नहीं दिया बल्कि उनकी यह कुर्बानी आने  वाले नौजवानों के लिए आदर्श, मार्गदर्शक, और एक महान दिशा बन गयी।

छोटे बेटे कहाँ कम थे। जहाँ बड़े बेटों ने अपनी शूरवीरता और युद्ध-कौशल से  खूंखार और ज़ालिम मुग़ल सिपाहीओं के हौंसले परास्त कर दिए वहीं छोटे बेटों (साहिबज़ादा  ज़ोरावर सिंह, उम्र  9 साल, और साहिबज़ादा  फ़तेह सिंह, उम्र 6 साल) ने तो अपनी बुलंद, महान, और निडर सोच से क़ाज़ी जैसे धार्मिक आगू को भी घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। क़ाज़ी भी उनकी निडरता और महान विचारों से हैरान हो गया पर मुस्लिम सरकार के आगे सब बेबस और मजबूर थे और उन्हें दीवार में जिन्दा चिनवाने का हुक्म दे दिया गया। दीवार में चिनवाने से पहले उन्हें कईं तरह के प्रलोभन और डर भी दिए गए पर वो आखिर ठहरे गुरु गोबिंद सिंह जी के लाल, किसी किसम की लालच या डर उन्हें सचाई, धर्म, और मानवता की राह से नहीं डगमगा सकता था।  यही वह कुर्बानी थी छोटे बेटों की जो पूरी दुनिया में आज भी एक महान कुर्बानी का  दर्ज़ा लिए हुए है और इसकी मिसाल पूरी दुनिया में कहीं भी दिखने या  पढ़ने को नहीं मिलती। आखिर  6 और 9  साल की उम्र होती ही कितनी है की एक बच्चा यह सोच ले की उसने अपनी कुर्बानी देनी है, उसे अपने पिता के बताये हुए मार्ग पर चलना है। उसे सचाई, ईमान, धर्म, और न्याय के लिए आवाज उठानी है। इन महान बच्चों का आज भी कोई सानी नहीं है, कोई भी इनके मुक़ाबले की मिसाल नहीं है।

तीसरी कुर्बानी उन्होने दी अपनी माता जी के रूप में। जब उनकी माता जी ‘माता गुजर कौर’ जोकि  सरहन्द के  ठंडे बुर्ज में कैद थी को यह खबर दी गयी की उनके छोटे साहिबज़ादों को दीवार में जिन्दा चिनवा दिया गया है तो उन्होने अपने प्राण त्याग दिए। उनकी माता जी के उम्र उस वक़्त 81 साल थी। एक दादी  का  इस बुजर्ग अवस्था में अपने छोटे साहिबज़ादों की कुर्बानी के बाद अपने  प्राणों का बलिदान देना अपने आप में पूरी दुनिया में एक मिसाल है।

और आखिरी कुर्बानी दी उन्होने अपनी ख्वाइशों की, अपनी इंसानी जरूरतों की, अपने परिवार के मोह की, आम सांसारिक प्रलोभनों की और अंत में अपने प्राणों की।  खालसा पंथ की नींव उन्होने तब रखी जब भारत में हर जगह जाती-पाती, धर्म के नाम पर अंधविश्वास, और मुसलमान शासकों की बर्बरता की प्रचंड आंधियां चल रही थी। खालसा पंथ के निर्माण के लिए जो पांच प्यारे उन्होने चुने वह भी पिछड़ी और दबी हुई जातिओं से चुने ताकि  पूरे समाज में यह सन्देश जाए की खालसा फ़ौज सबसे नयारी है जो किसी भी जाती-पाती जैसी भावना से परे है।

जो किसी भी उंच-नीच या अमीरी-गरीबी की तंग जमीन से बहुत ऊपर है। पर आज बड़े अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि जिस गुरु ने अपने लाडले परिवार और अपनी जान देकर जिस सीखी के पेड़ को अपने कीमती खून और पसीने से सींचा था आज उसी पेड़ को उसी के अपने सिख बेदर्दी से काटने में मस्त हैं। कहाँ गए वो गुरु गोबिंद जी के दलेर और महान सिख जो कभी गुरु जी की एक आवाज पर अपनी जान कुर्बान कर देने के लिए तैयार बार तैयार रहते थे, कहाँ गए वो गुरु के अणखी और जुझारू सिख जो कभी धर्म, सचाई, और ईमान के लिए आपस में इकठे  होकर, हाथों में नेजे और तलवारे लेकर  दुश्मनों के  साथ एक एक हाथ करने के लिए हमेशा तैयार रहते थे?

पर बड़े अफ़सोस के साथ इस बात को कबूल करने में शर्म आती है कि आज उन्हीं सिखों (या हमारे सिखों) के हाथों में गुरबाणी के गुटके नहीं अपितु शराब और नशे की बोतलें हैं, आज हमारे ही सिख भाईओं में धर्म और इंसानियत के दुश्मनों के लिए तलवारें नहीं बल्कि अपने ही सिख भाईओं के लिए बंदूकें और तलवारें खड़ी हो जाती हैं, आज हम दुश्मनी ताकतों के खिलाफ नहीं एकजुट होते बल्कि अपने ही जागे हुए ओर समझदार सिख भाइयों के खिलाफ मोर्चा बंधी करते हैं, ओर तो  ओर आज हमारी ही पड़ी लिखी और होनहार सिख लड़कियां गुरबाणी पड़ने वाले या इंसानियत या सचाई या मेहनत की राह पर चलने वाले सिख नौजवानों के साथ शादी के पवित्र बंधन में बंधने के लिए राजी नहीं! ऐसा क्यों? इसके पीछे कौन जिम्मेवार है? हम खुद या ओर कोई?  यह बातें ओर भी छोटी हो जाती हैं जब हम इस बात पर गौर करते हैं की आज हम सिख लोग यह नहीं फैसला कर पा रहे हैं की गुरु गोबिंद सिंह या गुरु नानक देव जी का जन्म किस दिन  होता है!

क्या यही हमारे  गुरुओं की सीख थी  जिसकी बदौलत आज हम आपस में ही लड़ने झगड़ने लगे हैं? क्या गुरुओं ने हमें इसलिए सिख ओर खालसा बनाया था की हम आपस में ही बैर रखने लगें, आपस में ही एक दूसरे को अपमानित करने लगें, ओर आपस में ही अपने ही सिख भाईओं का कतल करने लगें? आज की  तारीख में मेरे अंदर अपने सिख लीडरों या आगुओं के लिए इतना गुस्सा है कि समझ नहीं आती कि आखिर वे अपने ही महान ओर न्यारे खालसा पंथ या जीने के सिखी अंदाज़ की गहरी हो चुकी झड़ों को क्यूँ काटने में लगे हुए हैं, वे आखिर क्यों नहीं चाहते की पूरी सिख कौम आपस में एक परिवार की तरह काम करे? पहली मैं सिखी को लेकर इतने भर्म ओर दिमागी उथल पुथल में नहीं था जितना की आज, पहले तो यह भी पता था की गुरपुरब (गुरु का प्रकाश उत्सव या ज्योति ज्योत उत्सव) कब है ओर आज गनीमत हालत यह है कि किसी गैर-सिख के पूछने पर कि गुरपुरब कब है शर्म आने लगती है कि उसे क्या बतायें क्यूंकि आज अपने ही सिख भाई आपस में इस बात को लेकर गुट बनाये हुए हैं कि फलानि तारीख को गुरपुरब है ओर फलानि को नहीं।

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