RSS के बनने की सच्ची कहानी!

RSS बनने  की  शुरुआत  उसी  दिन  से  हो  गयी  थी  जब  ‘All India Muslim League’ की  foundation 1906 में  रखी  गयी  थी।  ‘All India Muslim League’  was a political party जो  कि   Sir Syed Ahmad Khan की   literary movement ‘the Muhammadan Educational Conference’ के  गर्भ  से  निकली  थी।  इस  literary movement की  स्थापना  1886, Aligarh Muslim University में  की  गयी  थी।  The main purpose of this league was to protect the Indian Muslim’s civil rights and to secure protection to the elite class of Indian Muslims.

‘All India Muslim League‘ जो  कि  मुस्लमानों  के  rights  के  लिए  काम  कर  रही  थी  ‘Morley Minto Reforms’ (1909) के  आने  से  और  भी  strong हो  गयी  थी। ‘Morley Minto Reforms’ or ‘Indian Councils Act’ जो  की  Britishers के  द्वारा  paas किया  गया  एक  act था ( एक  सोची  समझी  रणनीति)  जिसके  तहत  वो  मुस्लमानों  और  हिन्दुओं  में  फूट  डालना  चाहते  थे। The act was passed to make Indians eligible to get elected for Legislative Councils, to prepare groundwork for parliamentary form of government in India and to create division between Hindus and Muslims on the basis of separate electorates

Jab ‘All India Muslim League’ और  ‘Morley Minto Reforms’ के  आने  से  मुस्लमानों  में  एक  नयी  चेतना आ  गयी। उन्हें   लगने  लगा  कि  Britishers उनके  साथ  हैं  और  उनको  full support कर  रहे  हैं।  Britishers का  मुस्लमानों  को  दी  जाने  वाली  preferential treatment देख  कर  कुछ  हिन्दू  leaders   like  Lala Lajpat Rai, Lal Chand and Shadi Lal (Arya Samaji Leaders) यह  देख  कर  सोचने  लगे  कि  यह  तो  उनकी  community के  साथ  धोखा   है, sheer injustice है। So, in reaction, to protect the political and economic rights of majority of Hindus as well they formed ‘Punjab Hindu Mahasabha’ in 1909।  यही  ‘Punjab Hindu Mahasabha’ बाद  में  ‘Sarvadeshak Hindu Sabha’ or ‘All India Hindu Sabha’ बन  गयी  (April 1915).  बाद  में  April 1921 में  एक  बड़ी  conference रखी  गयी  जिसमें  Pandit Madan Mohan Malaviya who founded ‘Banaras Hindu University’ और  Lala Lajpat Rai शामिल  थे।  उस  conference में  ‘All India Hindu Sabha’ का  नाम  बदल  कर  ‘Akhil Bhartiya Hindu Mahasabha’ रख  दिया  गया।

V  D Savarkar ने  ‘Akhil Bhartiya Hindu Mahasabha’ को  अपनी  pro-Hindu ideology से  इतना  प्रभावित  किया  कि  यही  पार्टी  आगे  चल  कर  Congress और  उसकी  pro-Muslim policies के  कट्टर  विरोधी  बन  गयी।   Mahasabha के  leaders को  ऐसा  लगने  लगा  था  कि  Congress party Nehru और  Gandhi के  control में  आकर  मुस्लमानों  को  appease करने  की  कोशिश  कर  रही  है। उन्हें  ऐसा  लग  रहा  था  की  कहीं  ऐसा  न  हो  जाए  की  मुस्लमानों  को  खुश  करने  के  चक्कर  में  Hindus अपने  ही  देश    में  marginalized न  कर  दिए  जाएँ। Hindu Leaders अपने  culture, traditions, beliefs, heritage और  religion को  लेकर  काफी  serious और  particular हो  गए।  Mahasabha के  leaders अपनी  anti-Congress और  pro-Hindu politics को  लेकर  इतने  fanatic हो  गए  थी  कि they even didn’t participate in India Freedom Movement, Quit India Movement and Civil Disobedience Movement।  जहाँ  तक  कि  Mahasabha के  prominent leader Shyama Prasad Mukherjee ने  भी  ‘Quit India Movement’ का  तीखा  और  डट  के  विरोध  किया। एक  time ऐसा  भी  देखा  गया  जब  ‘Hindu Mahasabha’  ने  ‘Muslim League’ के  साथ  हाथ  मिलाया  और  कुछ  जगहों  पर  अपनी  सरकार  भी  बनाई।  पर  फिर  भी  वह  basic hatred और  resentment जो  इन  दो  communally-charged parties को  जिन्दा  रखे  हुए  थी  एक  percent भी  काम  न  हो  सकी।  It is also a reality that in parties के  leaders में  भी  ideological differences चल  रहे  थे।  और  यही  differences आगे  चल  कर  इनके  लिए  harmful साबित  हुए।

Keshav Baliram Hedgewar, जो  कि  Mahasabha के  ही  member थे, अपनी  ही  party से  भागी  हो  गए  और  1925 में  अलग  से  एक  नई party बना  डाली  जो  बाद  में  RSS (Rashtriya Swayamsewak Sangha) के  नाम  से  popular हो  गयी।  Agha Khan, Jinnah aur Allama Iqbal से  प्रेरणा  लेकर  ‘Muslim लीग’ ने  1940 में  ‘Separate Nation’ की  demand की  और  उनकी  यह  demand  Britishers द्वारा  पूरी  भी  कर  दी  गयी।  और  1947 में   इन  leaders की  cheap politics और  intellectual blindness ने  India के  2 टुकड़े  करा  दिए  और  जिसका  घाव  आने  वाली  कईं  सदिओं  तक  नहीं  भरे  जाने  वाला  था।  Kashmir तो  आज  भी  उस  ‘Partition’ की  भीषण आग  में  धू  धू  कर  जल  रहा  है। Congress party भी  Jinnah के  contact में  थी  और  पूरी  तरह  इस  ‘Partition’  के  support में  थी।  Savarkar को  Congress का  यह  दोगलापन  पसंद  नहीं  था  कि  Hindu-dominant party होकर  वह  two-nation theory को  support   कर  रही  है  और  मुस्लमानों  का  साथ  दे  रही  है।  Partition के  बाद  Congress  Mahasabha की  कट्टर  दुश्मन  बन  गयी  थी  और  30th Jan 1948 में  Nathuram Godse, जो  कि  Mahasabha  से  अलग  होकर  बनी RSS  के  ही  member थे, ने  Mahatma Gandhi का  assassination कर  दिया।  Shyama Prasad Mukherjee, जो  एक  अहम्  पद  पर  Mahasabha में  काम  कर  रहे  थे, अपनी  अलग  ideology लेकर   Mahasabha से  अलग  हो  गए  और  बाद  में  ‘Bhartiya Jana Sangha’ (in association with RSS) की  स्थापना  की  जो  आज  BJP के  नाम  से  मशहूर  है।

RSS की creation को लेकर बहुत सारी बातें प्रचलित हैं। कोई कहता है की यह organization Britishers ने बनाई थी ताकि वे मुसलामानों को handle कर सकें। कोई कहता है कि इसकी foundation anti-Muslim theory को बढ़ावा देने के लिए कि गयी थी। इन बातों में कितनी सच्चाई है यह तो सिर्फ RSS ही जानती है। यह तो जितने मुहं उतनी बातें वाली बात हो गयी।

अगर देखा जाए तो जितनी भी बड़ी political parties आज India में हैं उन सब की foundation religious, caste या regional differences हैं। National unity, national harmony and national development का मुद्दा कोई भी नहीं बनाता क्युंकि सभी parties जानती हैं की इन grounds पर votes नहीं मिलती। जब तक हम caste, religion और region based narrow और cheap politics नहीं छोड़ेंगे तब तक हमारे भारत का कुछ नहीं हो सकता।

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