सरहद…

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सरहद पर बैठा हूँ, धमाकों की आवाज़ है,

दर्द क्या ब्यान करूँ, नहीं कोई अलफ़ाज़ है,

बच्चे सहमे हुए हैं बड़ों के होठों पर सिर्फ नमाज़ है।

जो साथी अब नहीं रहा उसकी क्या कमी है,

जो बैठे हैं दिल्ली में उनको क्या एहसास है।

 

जिसका बेटा चला गया है वो क्यों इतनी हताश है?

चेतावनी, कड़ी निंदा ही इस देश का रिवाज़ है।

भूल जाएंगे हम भूल जाएंगे सब,

शायद भूल जाना ही हमारा मिज़ाज है।

 

मंच पे शहीदों को पैसों से तोलता है कोई और चारों और तालिओं की आवाज़ है,

सुनकर मेरा दिल निराश है और सोचता हूँ यह कैसा देश और कैसा समाज है।

By Roohdaar…

Contact the writer at: roohdaar99@gmail.com

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