जब दिल कराह उठा बाबरी मस्जिद और राम मंदिर के नाम पर…

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मुद्दा कुछ  ओर था पर नाम दे दिया बाबरी मस्जिद और राम मंदिर का,

तलवारें खिंचवा दी धर्म के नाम पर और खून बहा दिया गरीब इंसान का,

यह कैसी राजनीती है मेरे दोस्तों खुद तो बैठे हैं आलीशान महलों में घर जलवा दिया हिन्दू-मुसलमान का।

 

खुदा कह लो या भगवान् वो भी कांप उठा होगा देखकर यह मंजरे-कत्लेआम,

दर्द  की आह भर  कर वह भी पूछ उठा होगा कौन है यह ‘खुदा’ और कौन है यह  ‘राम’?

 

मंत्री कोई भी हो ,यह कैसी खेल दी इन्होने इंसानी खून की होली,

खुद तो आज तन कर बैठे हैं राज गद्दी पर पर खाली कर दी कईं माओं की झोली।

यह कैसी है राजनीति और यह कैसी है होली?

 

वो ‘खुदा’ भी क्या जो पीएगा खून ‘राम’ का मस्जिद के लिए,

वो ‘राम’ भी क्या जो पियेगा खून ‘खुदा’ का मंदिर के लिए,

ये तो मंत्रियों की सरासर  मक्कारी है  जो घडते हैं ऐसे मुद्दे अपने फायदे के लिए।

 

धर्म के नाम पर तबाह कर डाला होनहार युवक मेरे देश का,

जो कहीं पहुँच सकते थे किसी मुकाम पर आज उनके हाथों में थमा डाला खंजर और त्रिशूल, एक खुदा का, एक राम का।

 

 

शर्म कहाँ आती है इन गद्दी और शोहरत के भूखों को,

धर्म क्या, इंसान क्या, इंसानियत क्या, मोहब्बत क्या, ये क्या जानें आम इंसान के दुखों को।

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