कलयुगी गुरु, कलयुगी धर्म और कलयुगी भक्त!!!

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Love Charger  बाबा राम रहीम के अंध भक्तों द्वारा पंचकूला में  गुंडों और उग्रवादिओं की तरह की गयी अंधाधुन्द आगजनी, तोड़फोड़ और मारधाड़ से एक बात तो साफ़ हो गयी कि हिंदुस्तान में धर्म के नाम पर कुछ भी कराया जा सकता है।  धर्म के नाम पर लोगों को बड़ी आसानी से गुमराह किया जा सकता है। धर्म के नाम पर भोले भाले और मासूम इंसान  को किस तरह  चालाकी से चलते फिरते और खतरनाक हथियार  में तब्दील किया जा सकता है। धर्म के नाम पर लोगों को कैसे अफीम सी लगने वाली बातों से प्रभावित कर कर  झूठ को सच की चादर में लपेटकर इंसानियत, आम जनता और सरकार के खिलाफ खड़ा किया जा सकता है। धर्म के नाम पर किस तरह  आसानी से पैसा और शोहरत कमाए जा सकते हैं।

पंचकूला में लाखों की तादाद में  अंध भक्तों का अपने बलात्कारी और मक्कार बाबा के समर्थन में यूँ पागलों की तरह अपनी जान को जोखिम में डालकर आक्रोश और  विनाशकारी प्रदर्शन  करना क्या इस बात की तरफ इशारा नहीं करता कि हम हिन्दुस्तानी किस तरह धर्म के नाम पर अपनी सोचने और समझने कि शक्ति खो बैठते हैं। कि किस तरह हम अपने आम जीवन की परेशानिओं से तंग आकर और इनका खुद कोई सही हल ढूंढ़ने के बजाये धर्म के नीच और दुराचारी गुरुओं या  ठेकेदारों की तरफ झुकना शुरू कर देते हैं। इन पाखंडी गुरुओं  धर्म (जिसकी सही परिभाषा भी हमें अब तक नहीं मालुम) के नाम पर की गयी मीठी मीठी बातों में आकर उन लोगों को अपना गुरु मानना शुरू कर देते हैं जिन्हें सिर्फ हमें लूटना और बेवकूफ बनाना आता है और कुछ नहीं। जिन्हें सिर्फ हमें अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना आता है और कुछ नहीं। जिन्हें सिर्फ पैसा, शक्ति और शोहरत इकठी करना आता है और कुछ नहीं। जिन्हें सिर्फ अपने तुछ स्वाद पूरे करने आते हैं और कुछ नहीं।

कैसा कलयुग है कि जहाँ एक तरफ सरकार की लापरवाही के कारण उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में 70  से ज्यादा बच्चे oxygen  न मिलने के कारण मोत के मुहं में चले जाते हैं  और हमारे दिल में जरा सा भी भी दर्द नहीं होता बल्कि नपुंसकों कि तरह अपने घरों में AC  की ठंडी हवा खा रहे होते हैं और सड़कों पर रोष प्रदर्शन करने के बारे में कभी नहीं सोचते  और दूसरी तरफ धर्म के नीच ठेकेदारों या बलात्कारी बाबाओं के खिलाफ जब कोर्ट का उनके खिलाफ फैसला आता है तो हम  उनके समर्थन में लाखों की तादाद में हाथों में लाठीआं और तेज़धार हथियार लेकर सड़कों पर उतर आते हैं। क्या यही हमारी शूरवीरता है। क्या यही हमारी संवेदना और दर्द है मासूम बच्चों को लेकर? क्या यही हम वो हिन्दुस्तान के लोग हैं जिन्हें गुरु नानक, महात्मा बुद्ध या परमहंस योगानंद जैसे महान गुरुओं का आशीर्वाद प्राप्त है? क्या यही हमारी दिलेरी है कि बच्चों कि मौत पर हमें कोई दुःख नहीं होता पर एक दुराचारी, पाखंडी और बलात्कारी बाबा के जेल में जाने पर हम पर दुखों का पहाड़ टूट जाता है। हमारी सुध बुद्ध खो जाती है।  क्या धर्म हमें यही सिखाता है। क्या यह धर्म है या अधर्म? क्या यह इंसानियत है या हैवानियत? क्या यह हम इंसानों का साधापन है या दोहरापन?  शर्म आनी चाहिए हमें कि हम अपने देश की धरती को धर्म कि जननी मानते हैं , अपने आप को महान गुरुओं की संतान मानते हैं और जब छोटे छोटे और मासूम बच्चे अस्पताल में बेदर्दी से मारे जाते हैं हम कुछ भी नहीं कर पाते! सिर्फ तमाशाबीन होकर अपनी नपुंसकता की गवाही देते हैं।

अगर अभी भी हमारे अंदर कुछ मात्र शर्म या संवेदना बची है तो तो आओ आज ही फैसला कर डालें कि आगे से हम कभी भी इन पाखंडी और दुराचारी बाबाओं के बहकावे में नहीं आएंगे, अपनी परेशानिओं का हल ढूंढ़ने के लिए कभी भी इनके पास नहीं जाएंगे, लोगों के द्वारा किये गए इनके झूठे प्रचार में कभी भी नहीं आएंगे बल्कि खुद उस भगवान् पर विश्वास रख कर, थोड़ा कर्म और थोड़ी सी  हिम्मत कर कर अपने दिमाग को ठंडा और एकाग्रित करके अपने दुखों और परेशानिओं  का हल ढूंढ़ने कि भरपूर कोशिश करेंगे। भगवान् को दिल से याद करते हुए,  कर्म करते हुए,  सच कि राह पर शूरवीरों कि तरह चलते हुए और जरूरतमंद की दिल से मदद करना ही धर्म है और धर्म कि सही परिभाषा है।

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